इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में कहा था कि 'पीड़िता के स्तन को छूना और पायजामी की डोरी तोड़ने को बलात्कार या बलात्कार की कोशिश के मामले में नहीं गिना जा सकता है.'
इस पर, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाई कोर्ट का फ़ैसला ‘पूरी तरह से असंवेदनशीलता और अमानवीय दृष्टिकोण को दर्शाता’ है. सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले पर रोक लगा दी है.
बेंच ने अपने फ़ैसले में कहा, “हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि इस विवादित फ़ैसले में की गईं कुछ टिप्पणियां, खासतौर पर पैरा 21, 24 और 26, फ़ैसला लिखने वाले की संवेदनशीलता की कमी को दिखाता है.”
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फ़ैसले पर स्वतः संज्ञान लिया था.
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले से बेहद मज़बूती के साथ असहमति जताई. बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट का फ़ैसला ‘हैरान’ करने वाला था.
ये मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज इलाके का है. घटना साल 2021 में एक नाबालिग लड़की के साथ हुई थी.
कासगंज के विशेष जज की अदालत में इस नाबालिग लड़की की मां ने पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था, लेकिन अभियुक्तों ने इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाख़िल की.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि 'ये मामला गंभीर यौन हमले के तहत आता है.'